Tamil Nadu में हिंदी पर सियासत, इतिहास से वर्तमान तक: क्या अब भी जिंदा है ‘हिंदी विरोध’?

Tamil Nadu में हिंदी को लेकर विवाद कोई नया मुद्दा नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें इतिहास में गहराई तक मौजूद हैं। आज जब एक बार फिर तीन-भाषा नीति और हिंदी को लेकर बहस तेज हो रही है, तो 1965 का हिंदी-विरोध आंदोलन फिर चर्चा में आ गया है। उस दौर की एक घटना आज भी लोगों की स्मृति में जिंदा है—जब एक प्रदर्शनकारी ने केंद्रीय बल के जवान को ललकारते हुए कहा, “अगर हिम्मत है तो गोली चलाओ।” पहले उसे पैर में गोली लगी, इलाज के बाद वह फिर प्रदर्शन में लौट आया, लेकिन दूसरी बार गोली लगने से उसकी मौत हो गई। तमिलनाडु में उसे ‘अनडेड प्रोटेस्टर’ के रूप में याद किया जाता है।
1965 में ऑफिशियल लैंग्वेज एक्ट के विरोध में Tamil Nadu के कई शहरों—मदुरै से चेन्नई तक—बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। उस समय देश के प्रधानमंत्री Lal Bahadur Shastri थे। हालात इतने बिगड़ गए थे कि केंद्रीय बलों को तैनात करना पड़ा और फायरिंग में कई लोगों की जान चली गई। इस आंदोलन ने राज्य की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया और DMK जैसी क्षेत्रीय पार्टी को मजबूत आधार मिला।
आज भी Tamil Nadu में हिंदी को लेकर संवेदनशीलता साफ दिखाई देती है। राज्य में तीन-भाषा फॉर्मूला लागू नहीं है, और इसका असर सार्वजनिक जीवन में भी नजर आता है। उदाहरण के तौर पर, चेन्नई के रेलवे स्टेशनों पर जहां हिंदी, तमिल और अंग्रेजी तीनों भाषाओं में बोर्ड लगे होते हैं (क्योंकि वे केंद्र सरकार के अधीन हैं), वहीं राज्य सरकार की इमारतों पर हिंदी अक्सर गायब रहती है। यह एक तरह से भाषा-आधारित प्रशासनिक विभाजन को दर्शाता है।
हाल के वर्षों में हिंदी विरोध के प्रतीकात्मक और उग्र दोनों रूप देखने को मिले हैं। चेन्नई पार्क रेलवे स्टेशन पर हिंदी में लिखे नाम पर काला पेंट पोत दिया गया था। यह घटना उस समय हुई जब प्रधानमंत्री के दौरे से पहले विरोध जताया गया। ऐसे मामलों में अक्सर छोटे संगठन सामने आते हैं, लेकिन राजनीतिक दलों के अप्रत्यक्ष समर्थन की चर्चा भी होती रहती है।
Tamil Nadu में हिंदी विरोध की जड़ें करीब 90 साल पुरानी हैं। 1937 में जब मद्रास प्रेसिडेंसी के मुख्यमंत्री सी. राजगोपालाचारी ने स्कूलों में हिंदी अनिवार्य की, तब इसका विरोध शुरू हुआ। सामाजिक सुधारक पेरियार ने ‘हिंदी थोपना’ जैसे नारे दिए, जो आज भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा हैं। यही कारण है कि यहां हिंदी को आज भी एक वैकल्पिक भाषा के रूप में देखा जाता है, न कि अनिवार्य रूप में।
हालांकि, इस विरोध के बीच एक दूसरा पक्ष भी मौजूद है। कई लोग हिंदी सीखने को उपयोगी मानते हैं। चेन्नई स्थित ‘दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा’, जिसकी स्थापना Mahatma Gandhi ने की थी, आज भी सक्रिय है और यहां छात्र हिंदी सीखते हैं। कुछ छात्रों का मानना है कि हिंदी जानने से देश के अन्य हिस्सों से जुड़ने में आसानी होती है।
इसके बावजूद, उच्च शिक्षा में हिंदी की स्थिति कमजोर दिखाई देती है। मद्रास यूनिवर्सिटी में हिंदी में मास्टर्स करने वाले छात्रों की संख्या बेहद कम है। विशेषज्ञ मानते हैं कि आज के युवा तकनीकी और पेशेवर शिक्षा की ओर अधिक आकर्षित हैं, जिससे भाषाई विषयों की लोकप्रियता घट रही है।
राजनीतिक स्तर पर भी हिंदी का मुद्दा लगातार गरम रहता है। हाल ही में Tamil Nadu के मुख्यमंत्री M. K. Stalin ने साफ कहा कि जब तक उनकी पार्टी सत्ता में है, राज्य में हिंदी अनिवार्य नहीं होने दी जाएगी। उनका यह बयान आने वाले चुनावों के संदर्भ में भी अहम माना जा रहा है।
वहीं, आम जनता की राय भी एकसमान नहीं है। कुछ लोग हिंदी को बोझ मानते हैं और इसे थोपे जाने का विरोध करते हैं, जबकि कुछ इसे एक अतिरिक्त कौशल के रूप में देखते हैं। दिलचस्प बात यह है कि हिंदी विरोध का मतलब यह नहीं है कि Tamil Nadu के लोग अन्य भाषाओं या संस्कृतियों के खिलाफ हैं। यहां के लोग अपनी भाषा और पहचान को लेकर बेहद भावनात्मक हैं, लेकिन साथ ही अन्य भाषाओं के प्रति व्यावहारिक दृष्टिकोण भी रखते हैं।
धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर भी राज्य में अलग-अलग विचार देखने को मिलते हैं। कुछ राजनीतिक बयान विवाद पैदा करते हैं, लेकिन आम जनता अक्सर संतुलित और सहिष्णु दृष्टिकोण अपनाती है। लोग मानते हैं कि भाषा और धर्म दोनों ही व्यक्तिगत और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं, जिन्हें जबरन नहीं थोपा जाना चाहिए।
कुल मिलाकर, Tamil Nadu में हिंदी विरोध केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक पहलुओं से जुड़ा हुआ है। समय के साथ इसके स्वरूप में बदलाव जरूर आया है, लेकिन इसकी संवेदनशीलता आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। आने वाले चुनावों में यह मुद्दा एक बार फिर केंद्र में रहने वाला है, और यह देखना दिलचस्प होगा कि बदलते भारत में भाषा की राजनीति किस दिशा में जाती है।




