Jaipur हाईकोर्ट ने सिविल प्रकृति के मामलों में पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज करने को लेकर एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आपसी लेनदेन, जमीन-जायदाद या कॉमर्शियल विवाद जैसे मामलों में बिना स्पष्ट आपराधिक तत्व के पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज करना कानून के विरुद्ध है। इस संदर्भ में अदालत ने न केवल संबंधित मामले में अग्रिम जमानत दी, बल्कि राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को भी सख्त निर्देश जारी किए हैं।
यह आदेश Jaipur हाईकोर्ट की जस्टिस प्रमिल कुमार माथुर की एकल पीठ द्वारा 18 अप्रैल को पारित किया गया। यह मामला टोंक जिले के निवाई थाने में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा हुआ था, जिसमें दो पक्षों के बीच व्यावसायिक लेनदेन को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ था।
मामला क्या था?
प्रकरण के अनुसार, एक पक्ष ने आरोप लगाया कि उसने दूसरे पक्ष को माल बेचा था, जिसकी कीमत लगभग 18 लाख रुपये से अधिक थी। आरोप था कि भुगतान नहीं किया गया, जिसके बाद मामला पुलिस तक पहुंचा और एफआईआर दर्ज कर ली गई।
हालांकि, आरोपी पक्ष ने अदालत में यह दलील दी कि यह पूरी तरह से एक सिविल विवाद है, जिसमें केवल पैसों का लेनदेन शामिल है और इसमें कोई आपराधिक मंशा या अपराध का तत्व नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस इस मामले को जबरन आपराधिक रूप दे रही है और गिरफ्तारी का दबाव बना रही है।
सुप्रीम कोर्ट और डीजीपी के निर्देश
इस मामले में बचाव पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेशों और 10 जून 2025 को जारी डीजीपी के सर्कुलर का हवाला दिया। उस सर्कुलर में स्पष्ट रूप से निर्देश दिया गया था कि:
- सिविल प्रकृति के मामलों में पुलिस एफआईआर दर्ज नहीं करेगी।
- यदि किसी मामले में सिविल और आपराधिक तत्वों के बीच भ्रम हो, तो संबंधित पुलिस अधीक्षक (एसपी) से लिखित अनुमति लेना अनिवार्य होगा।
- बिना पर्याप्त आपराधिक आधार के गिरफ्तारी नहीं की जाएगी।
इसके बावजूद निवाई थाना पुलिस ने इन निर्देशों की अनदेखी करते हुए सीधे एफआईआर दर्ज कर ली, जो कि अदालत के अनुसार गंभीर लापरवाही का मामला है।
अदालत की टिप्पणी और निर्देश
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि केवल भुगतान न करना या अनुबंध का उल्लंघन करना अपने आप में आपराधिक अपराध नहीं बनता, जब तक कि उसमें धोखाधड़ी, विश्वासघात या अन्य आपराधिक तत्व स्पष्ट रूप से सिद्ध न हों।
कोर्ट ने कहा:
“सिविल नेचर के मामलों में तब तक एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती, जब तक उसमें स्पष्ट रूप से आपराधिक तत्व मौजूद न हों। यदि कोई संदेह या विरोधाभास हो, तो एसपी से अनुमति लेना अनिवार्य है।”
अदालत ने यह भी पाया कि इस मामले में डीजीपी द्वारा जारी सर्कुलर का पालन नहीं किया गया। इस पर नाराजगी जताते हुए कोर्ट ने डीजीपी राजीव कुमार शर्मा को निर्देश दिए कि:
- सर्कुलर की अवहेलना के कारणों की जांच की जाए।
- जिम्मेदार पुलिस अधिकारी की पहचान कर उसके खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
- भविष्य में ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए नए निर्देश जारी किए जाएं।
अग्रिम जमानत और उसका महत्व
अदालत ने धर्मेंद्र ठक्कर और अन्य आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार करते हुए यह स्पष्ट संदेश दिया कि कानून का दुरुपयोग कर किसी को अनावश्यक रूप से परेशान नहीं किया जा सकता। अग्रिम जमानत देते समय अदालत ने यह भी ध्यान रखा कि मामला प्रथम दृष्टया सिविल प्रकृति का है और गिरफ्तारी की आवश्यकता नहीं है।
सिविल और क्रिमिनल मामलों में अंतर
यह मामला एक महत्वपूर्ण उदाहरण है कि कैसे सिविल और क्रिमिनल मामलों के बीच अंतर को समझना जरूरी है।
- सिविल मामले: इनमें आमतौर पर संपत्ति, अनुबंध, लेनदेन या पारिवारिक विवाद शामिल होते हैं, जिनका समाधान अदालत में मुकदमे के माध्यम से होता है।
- क्रिमिनल मामले: इनमें अपराध शामिल होते हैं, जैसे चोरी, धोखाधड़ी, हत्या आदि, जिनमें राज्य आरोपी के खिलाफ कार्रवाई करता है।
अक्सर देखा जाता है कि सिविल विवादों को दबाव बनाने के लिए आपराधिक मामलों में बदलने की कोशिश की जाती है, जो कि न्याय प्रणाली के दुरुपयोग की श्रेणी में आता है।
पुलिस की जिम्मेदारी
अदालत के इस आदेश से यह स्पष्ट हो गया है कि पुलिस को किसी भी शिकायत पर कार्रवाई करते समय कानून और उच्च न्यायालय/सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करना अनिवार्य है। बिना जांच के या केवल आरोपों के आधार पर एफआईआर दर्ज करना न केवल गलत है, बल्कि इससे निर्दोष लोगों को अनावश्यक परेशानियां भी झेलनी पड़ती हैं।
व्यापक प्रभाव
Jaipur हाईकोर्ट का यह आदेश पूरे राजस्थान के लिए एक महत्वपूर्ण दिशानिर्देश के रूप में देखा जा रहा है। इससे यह उम्मीद की जा रही है कि:
- पुलिस सिविल मामलों में एफआईआर दर्ज करने से पहले अधिक सावधानी बरतेगी।
- अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी।
- नागरिकों के अधिकारों की बेहतर रक्षा हो सकेगी।




